आसमान में काली साया।

फिर से प्रलय पसारी है।।

गर्जन तोयद की गायब है, जबसे अंधियारी छायी है।

शीत ऋतु सी ठंढक क्यों, इस जेठ माह में आई है।

आसमान में काली साया, फिर से प्रलय पसारी है।।

चोंच सुनहरी काया श्यामल, सरिक गीत सुनाती मैना।

एकाएक त्राटक बन बैठी, प्रश्न चिन्ह से उसके नैना।

आसमान में काली साया, फिर से प्रलय पसारी है।।

जुगनू भी गायब है अब तो, उजला जो दृत सा निकला।

पारिख का वो प्रलव दीप, सिमटा खुद में जैसे तृष्णा।

आसमान में काली साया, फिर से प्रलय पसारी है।।

गर्जत बदरी आसमान में, साया काली उड़ा उजियारा।

फैला है घनघोर विकटता, जैसे तम का हो अंधियारा।

आसमान की काली साया, फिर से प्रलय पसारी है।।

सूर्य निकल कर प्रश्न पूछता, प्राणी जगत, अचंभित सारा। शोकाकुल व्याकुल नभ पक्षी, तरुवर भी अब नहीं है न्यारा।

सिंह दहाड़ नीरव बन बैठा, दारुण सी मुस्कान लिए।

ऋतु भी क्रोधित बनी हुई है, इंद्र का जैसे वज्र लिए ।।