भीड़ में हर तरफ चेहरों से घिरा अकेला हूँ,

इस शहर के हुजूम़ में खुद से कटा अकेला हूँ।

शोर इतना है कि आवाज भी सुनाई न दे,

दिल के सन्नाटे में बस गूंजता अकेला हूँ।

साथ चलते हैं तमाम लोग यहाँ राहों में,

मंजिलों पर मगर सबसे जुदा अकेला हूँ।

रात भर जाग के सोचूँ यही किससे कहूँ,

दिल की हर बात में खुद से भरा अकेला हूँ।

घर के रिश्ते भी अब कागज के बने लगते हैं,

छू के देखा तो हर इक रंग उड़ा, अकेला हूँ।

वक्त के साथ सभी लोग बदल जाते हैं,

जो था अपना वही मुझसे खफा अकेला हूँ।

आईना देख के खुद से भी नजर मिलती नहीं,

अपने ही अक्स से जैसे डरा अकेला हूँ।

‘सत्येन्द्र’ शहर में जीते हुए ये समझा है,

भीड़ जितनी बढ़े, उतना अधिक अकेला हूँ।।