यह रचना उस दुनिया की कहानी कहती है जहाँ अख़बार खुद नहीं लिखते, बल्कि लिखवाए जाते हैं; जहाँ स्याही का रंग केवल काला नहीं, बल्कि उसमें छुपी होती है सत्ता की छाया, बाज़ार की चाल, और इंसान की ख़ामोशी। यहाँ हर खबर के पीछे एक अनकहा सच है, जो दिखता नहीं—या यूँ कहें कि दिखने नहीं दिया जाता। यह एक प्रश्न है—हमारे समय से, हमारे विवेक से, और हमारी संवेदनाओं से। यह बार-बार लौटकर हमें झकझोरता है कि आखिर क्या है जो हमारी आँखों के सामने होकर भी अदृश्य बना दिया गया है।

कवि सत्येन्द्र ने इस रचना के माध्यम से न केवल सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं को उजागर किया है, बल्कि एक आंतरिक पीड़ा और टूटन को भी स्वर दिया है। यहाँ शब्दों में एक आक्रोश है, एक बेचैनी है, और साथ ही एक गहरी संवेदना भी—जो पाठक के मन में उतरकर उसे सोचने पर मजबूर करती है।“काली स्याही” दरअसल उस अंधेरे की पहचान है, जो रोशनी के नाम पर फैलाया जा रहा है। यह ग़ज़ल हमें न केवल पढ़ने के लिए, बल्कि समझने और सवाल करने के लिए आमंत्रित करती है।--—अध्ययन क्लब

 

ये अख़बार है, ख़ुद कुछ भी नहीं लिखता,
कौन स्याही , कौन काग़ज़— अब नहीं दिखता।


तू बेनक़ाब है अपने ही आईने के अंदर,
मगर तुझे ही तेरा सच कहीं नहीं दिखता।


मेरे निज़ाम-ए-शौक़ को मिटाने की सियासत में,
अब किसी लफ़्ज़ में वो दिल भी नहीं दिखता।


सच यहाँ हर रोज़ बाज़ारों में बिकता है,
पर किसी चेहरे पे वो चेहरा नहीं दिखता।


मेरी नाकामियों का ही ज़िक्र होता है,
जो मिला मुझको वो क़िस्सा नहीं दिखता।


नए नवीसों की नज़र धुंधली सी रहती है,
उनको गुज़रा हुआ मंज़र अब नहीं दिखता।


कलम के हाथ में अब हक़ नहीं, हुकूमत है,
जो भी सच लिख दे वो अख़बार नहीं दिखता।


हर तरफ़ चेहरों पे गहरे से नक़ाब हैं,
कोई भी साफ़ सा आईना नहीं दिखता।


सियासत की धूप में सब जल ही जाता है,
अब कहीं छाँव सा एहसास भी नहीं दिखता।


झूठ के मेले में सच तन्हा ही रहता है,
उसका कोई भी यहाँ साथी नहीं दिखता।


मेरे अंदर की ये टूटन कोई क्या जाने,
ये शहर है यहाँ ज़ख्म ही नहीं दिखता।


तेरी यादों का धुआँ दिल में उठता रहता है,
मगर उस धुंध में तू अब कहीं नहीं दिखता।


कभी जो पास था, अब फ़ासलों में गुम है वो,
वो अपना सा कोई रिश्ता अब नहीं दिखता।


दिल के वीराने में आवाज़ भी खो जाती है,
कोई दर, कोई भी रस्ता अब नहीं दिखता।


किस कदर ख़ौफ़ है सच्चाई के बोलों से,
आदमी सच में भी खुलकर नहीं दिखता।


भीड़ में रह के भी तन्हा है हर इक इंसाँ,
कोई भी दिल से किसी का अब नहीं दिखता।


वक़्त के साथ बदल जाती हैं सब तस्वीरें,
कुछ भी पहले सा यहाँ अब नहीं दिखता।


"सत्येन्द्र" अपने ही लफ़्ज़ों में उलझा हुआ है,
उसको अपना भी रस्ता अब नहीं दिखता।


ये अख़बार है, ख़ुद कुछ भी नहीं लिखता,
कौन स्याही, कौन काग़ज़—कुछ नहीं दिखता।


#सत्येन्द्र तिवारी