भारतीय सभ्यता के इतिहास में अग्नि केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं रही; वह ज्ञान, चेतना और आत्मपरिवर्तन का भी प्रतीक रही है। वैदिक ऋषियों ने यज्ञ को केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं माना, बल्कि मनुष्य की आंतरिक यात्रा का माध्यम बताया। इसी वैदिक दृष्टि को आधार बनाकर रचित "त्रिपुण्ड : एक महायज्ञ" एक ऐसा दार्शनिक-मिथकीय उपन्यास है जो भारतीय ज्ञान-परंपरा को आधुनिक मानवीय प्रश्नों के साथ जोड़ता है।

कथा का आरंभ राजा शतानिक से होता है, जो एक आदर्श शासक होने के बावजूद अपने भीतर एक अनाम रिक्तता अनुभव करते हैं। राज्य समृद्ध है, प्रजा संतुष्ट है, किंतु सरयू के तट पर घटित होने वाली कुछ रहस्यमय घटनाएँ, प्राचीन यज्ञ-वेदियों का पुनः सक्रिय होना और अग्निनाड़ियों में असामान्य कंपन उन्हें यह संकेत देता है कि कोई अत्यंत प्राचीन शक्ति पुनः जागृत हो रही है।

राजपुरोहित, ऋषि शाण्डिल्य, नन्दीश्वर तथा अन्य विद्वानों के साथ शतानिक उस रहस्य की खोज आरम्भ करते हैं। उन्हें ज्ञात होता है कि प्राचीन ऋषियों ने कभी सप्ताग्नि नामक एक गुप्त ज्ञान-परंपरा की स्थापना की थी। यह सात अग्नियों का ऐसा आध्यात्मिक विज्ञान था जो मनुष्य की चेतना, स्मृति और आत्मबोध से जुड़ा था। समय के साथ यह ज्ञान लुप्त हो गया और उसकी रक्षा कुछ विरले साधकों के हाथों में रह गई।

यात्रा उन्हें हिमालय के दुर्गम हिमाश्रम तक ले जाती है, जहाँ उनका सामना रहस्यमयी साधक निर्वाणक और महामौन तपस्वी अर्चिस् से होता है। वहीं शतानिक पहली बार समझते हैं कि यज्ञ की वास्तविक वेदी बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर होती है।

हिमाश्रम में शाण्डिल्य का चालीस वर्ष पुराना अतीत सामने आता है। उनके प्रिय मित्र उद्गीथ और महान ऋषि वामदेव से जुड़ी घटनाएँ उद्घाटित होती हैं। पाठक को ज्ञात होता है कि शाण्डिल्य जीवन भर जिस अपराधबोध से ग्रस्त रहे, वह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के भविष्य से जुड़ा हुआ था।

इसी बीच कथा की दूसरी धारा में मैत्रेयी का प्रवेश होता है। वह केवल एक विदुषी नहीं, बल्कि प्राचीन संरक्षिका-परंपरा की उत्तराधिकारी है। उसकी यात्रा बाहरी से अधिक आंतरिक है। सरयू, जल, स्मृति और मौन की परीक्षाओं से गुजरते हुए वह यह समझती है कि संरक्षण का अर्थ किसी शक्ति को छिपाना नहीं, बल्कि उसके संतुलन की रक्षा करना है।

कथा के क्रम में यह भी स्पष्ट होता है कि ऋत्विक का वंश प्राचीन स्मृति-संरक्षकों का वंश है और नन्दीश्वर, राजपुरोहित तथा अन्य पात्र केवल सहायक नहीं, बल्कि उस महान परंपरा के अलग-अलग स्तंभ हैं जो युगों से ज्ञान की रक्षा करते आए हैं।

धीरे-धीरे एक नए पात्र का उदय होता है—मायाश्व।

वह उपन्यास का प्रतिपक्षी है, परंतु पारंपरिक अर्थों में खलनायक नहीं। मायाश्व युद्ध, हिंसा, लोभ और मानवीय पीड़ा का साक्षी रहा है। उसने निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अज्ञान नहीं, बल्कि अलग-अलग चेतनाओं का अकेलापन है। यदि प्रत्येक मनुष्य दूसरे की पीड़ा को प्रत्यक्ष अनुभव कर सके, तो संसार में हिंसा और विभाजन समाप्त हो सकते हैं।

इसी उद्देश्य से वह प्राचीन स्मृति-जाल को पुनर्जीवित करना चाहता है—एक ऐसी व्यवस्था जो समस्त मानव चेतना को एक साझा अनुभव में जोड़ दे।

यहीं से उपन्यास का मूल दार्शनिक संघर्ष प्रारम्भ होता है।

शतानिक का विश्वास है कि करुणा का निर्माण स्वतंत्र चेतना से होता है; उसे किसी व्यवस्था द्वारा आरोपित नहीं किया जा सकता। मायाश्व का विश्वास है कि सामूहिक करुणा के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कुछ अंश त्यागना उचित है।

यह संघर्ष अच्छाई और बुराई का नहीं, बल्कि दो नैतिक दृष्टियों का संघर्ष है।

इन रहस्यों की खोज अंततः सभी पात्रों को नैमिषारण्य के भूमिगत स्मृति-नगर तक ले जाती है। वहाँ प्रकट होता है स्मृति-जाल, चौथा द्वार और वह प्राचीन व्यवस्था जिसे वामदेव ने स्वयं सील कर दिया था। यहीं शाण्डिल्य का अतीत पूर्ण होता है, उद्गीथ की चेतना पुनः प्रकट होती है और मायाश्व अपने दर्शन का अंतिम औचित्य प्रस्तुत करता है।

चरम बिंदु पर अष्टम अग्नि का रहस्य उद्घाटित होता है। यह कोई अतिरिक्त शक्ति नहीं, बल्कि आत्मसंयम का सिद्धांत है। उपन्यास यह स्थापित करता है कि सर्वोच्च शक्ति अधिकार प्राप्त करना नहीं, बल्कि अधिकार होने पर भी उसका संयमित उपयोग करना है।

अंतिम अध्याय "अनादि चिह्न" में यह उद्घाटन होता है कि सप्ताग्नि स्वयं अंतिम सत्य नहीं थी। वह उस और भी प्राचीन ज्ञान की रक्षक थी जिसे अनादि चिह्न कहा गया। यह चिह्न किसी धर्म, संप्रदाय या सभ्यता का प्रतीक नहीं, बल्कि स्वतंत्र चेतना का शाश्वत प्रतीक है।

निर्वाणक प्रकट करते हैं कि वे केवल हिमाश्रम के रक्षक नहीं, बल्कि उसी अनादि परंपरा के अंतिम संरक्षक हैं जिससे स्वयं वामदेव ने शिक्षा प्राप्त की थी। अर्चिस् का अंतिम संदेश, शाण्डिल्य का आत्ममुक्ति-बोध, मैत्रेयी की संरक्षिका-दृष्टि और शतानिक का आत्मबोध एक बिंदु पर आकर मिलते हैं।

अंततः मायाश्व यह स्वीकार करता है कि उसकी करुणा सत्य थी, परंतु उसने करुणा को स्वतंत्रता से ऊपर रख दिया था। वह अपने संघर्ष का अंत प्रतिशोध में नहीं, बल्कि आत्मस्वीकार में करता है।

उपन्यास का समापन किसी युद्ध की विजय से नहीं, बल्कि एक दार्शनिक उद्घोष से होता है—

"चेतना का धर्म स्वतंत्र होना है, और स्वतंत्रता का धर्म उत्तरदायी होना।"

नैमिषारण्य पुनः मौन हो जाता है। स्मृति-जाल संतुलित हो जाता है। अग्नि बुझती नहीं, बल्कि अपने उचित स्थान पर स्थापित हो जाती है। शतानिक और मैत्रेयी किसी साम्राज्य के नहीं, बल्कि चेतना और उत्तरदायित्व के नए युग के वाहक बनकर उभरते हैं।

"त्रिपुण्ड : एक महायज्ञ" भारतीय दर्शन, वेद, उपनिषद, यज्ञ-परंपरा और मिथकीय चेतना से प्रेरित एक मौलिक उपन्यास है। यह पाठक को केवल रहस्य और रोमांच की यात्रा पर नहीं ले जाता, बल्कि एक ऐसे प्रश्न के सामने खड़ा करता है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है—

क्या करुणा स्वतंत्रता से बड़ी हो सकती है?

और अंततः यह उत्तर देता है—

मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति ज्ञान नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्र और उत्तरदायी चेतना है।1