ये अख़बार है, ख़ुद नहीं लिखता 

कौन स्याही कौन कागज़ अब नहीं दिखता

तू बेनकाब हो चुका है ,तेरे अंदर

वो उल्फ़त अब नहीं दिखता।

मेरे निजाम ए शौक को मिटाने की खातिर 

लिखाई जाती हैं मेरी नाकामियां 

जो हुआ हासिल अभी तक की खबर

नये नवीसों को कहीं नहीं दिखता ।

ये अख़बार है,खुद नहीं लिखता।।

##सत्य