#क्यों कह सकते हैं कि हड़प्पा बाहर में आयी है?→

इस मत का समर्थन करने वाले इतिहासकारों के अनुसार-

ⅰ) मेसोपोटामिया और हड़‌प्पाई नगरों से प्राप्त साक्ष्यों में समानता का होना जैसे- नगरों की बनावट, जल-निकास प्रणाली, हथियारो "एवं उपकरणों में समानता, चाक निर्मित बर्तनों का प्रयोग पहिएदार गाडियों का प्रयोग, भवनों में पक्की दे का प्रयोग, लिपि का ज्ञान (लेखन कला), • ऊंचे चबूतरों का प्रयोग, देवताओं के स्वरूप में समानता।

ⅱ) चूंकि मेसोपोटामिया का परिपक्व काल हडप्पा से लगभग 1500 वर्ष पहले का है इसलिए जॉन मार्शल, गार्डन चाइल्ड, मारटीमर व्हीलर आदि यह मानते है कि मेसोपोटामिया के विशेष लक्षणों का गमन हड़प्पा की ओर हुआ होगा।"

ⅲ) अधिकांश आरम्भिक हड़प्पा संस्कृतियां विकासक्रम में उस अवस्था को प्राप्त नहीं कर पायी थी कि वे एक महान् सभ्यता का जन्म दे सकें। अतः यह निष्कर्ष निकलना तर्क संगत नहीं होगा कि आरंभिक हडप्पाई संस्कृतियों से ही हडप्पा सभ्यता का जन्म हुआ होगा।.

** स्पष्टीकरण

जॉन मार्शल और उनके सहयोगियों के तर्क सामान्यतया तो स्वीकार किए जा सकते है लेकिन तकनिकी पक्ष उन्हें पूर्णतया स्वीकार नहीं करने देते। क्यों?.

क्योकि -

ⅰ) डेल्स ने मोहनजोदड़ो के निचले स्तरों (सब-स्वॉयल वॉटर )की सुदाई के दौरान पाया कि हड़प्पा सभ्यता की परिपक्वता से पहले तीन चरण और मौजूद थे। पुरातात्विक मान्यताओ के अनुरूप इन चरणों का समयकाल लगभग 3000 वर्ष ठहरता है। भारतीय संदर्भ में, जहां उत्थान और पतन अपेक्षाकृत जल्दी सम्पन्न हुआ इसलिए यूरोपिय पुराशास्त्रियों ने एक चरण की समयावधि 500वर्ष ही मानी है इस द्वाष्टि से यह कालावधि 1500 वर्ष ठहरती है। इसलिए हड़प्पा का आरंभिक बिन्दु या उद्भव 1500 वर्ष और पहले अर्थात् 4200 BC से 4500 BC के आसपास पहुंच जायेगा।

ⅱ) हड़प्पाई नगरों की संरचना तो मेसोपोटामिया जैसी है लेकिन नगर- नियोजन और जल-निकास प्रबंधन मेसोपोटामिया से कहीं बेहतर है (स्वयं इसकी पुष्टि सर जॉन मार्शल ने की है)। मेसोपोटामिया से मन्दिर के अवशेष मिले है लेकिन हडप्पा में अभी तक ऐसा कोई भी भवन नहीं मिला जिसे सर्वसम्मति से मंदिर की संज्ञा दी जा सके। यही नहीं शवाधान रीतियों में भी मेसोपोटामिया से के कुछ भिन्नताएं हैं जबकि लिपि में आधारभूत अंतर है। उदाहरण के तौर पर मेसोपोटामिया की किलाकार लिपि में 1000 हजार अक्षर है जबकि हड़प्पा की लिपि भाव चित्रात्मक (पिक्टोग्राफिको) है जिसमें लगभग 350-450 अक्षर है (यद्यपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी)।

कोई भी समुदाय (संस्कृति) अथवा क्षेत्र विशेष तब तक बाहरी, जटिल और प्रगतिशील तत्वो को आत्मसात नहीं कर सकता जब तक की सक्षम मानव समुदाय में बाहरी तत्वों को धारण करने के लिए आर्थिक क्षमता, कौशल आदि न हो। इसलिए यदि समस्त तत्व बाहर से आये भी रहें हों तब भी वे तब तक स्थायित्व ग्रहण नहीं कर सकते थे जब तक की वहां के निवासी उसके अनुकूल योग्यता व कौशल क्षमता न रखते हों।

**निष्कर्ष:-

 उपरोक्त चर्चा का तात्पर्य यह हुआ कि हड़प्पा में कुछ तत्व अवश्य बाहर से आए होगे, संभव है कि वे किसी आदान-प्रदान का परिणाम हों इसलिए यह मानना तर्क संगत नहीं लगता कि समग्र सभ्यता आयातित थी बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि आरम्भिक हड़प्पाई संस्कृतियों ने अपने विकास क्रम में हो सकता है कि कुछ बाहरी तत्व अवश्य ग्रहण किए हो। इस दृष्टि से डी० डी० कौशाम्बी का तर्क अधिक उचित प्रतीत होता है, वे मानते है कि नदी-घाटियों में पनपी समकालिन सभ्यताओं (मिस्र, मेसोपोटामिया, सिन्धु) में कुछ तत्व समान है, कुछ स्थानीय और कुछ ऐसे जो वहां कि मूल जीवन शैली से मेल नहीं खाते। इसलिए यह माना जा सकता है कि एक ही मानव समुदाय की अलग-अलग टोलियों ने नदी -घाटियों में सभ्यताओं का निर्माण करते समय अपने साथ लायी गयी प्रविधियों का प्रयोग करने के साथ स्थानीय भौगोलिक पारिस्थितियों के अनुसार कुछ नई तकनीको का भी इजाद किया था। इस तरह से उन सभ्यतओ में कुछ समान व कुछ स्थानीय लक्षण प्रकट हुए लेकिन इनका उद्‌भव मौलिक था आयातित नहीं।