आरंभिक हड़प्पाई बस्तियों का भौगोलिक विस्तार सिंघ, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बलुचिस्तान तथा अफगानिस्तान तक था। हड़प्पा पूर्व के कुछ महत्वपूर्ण स्थलों में काली पंगा, बनावली, राखीगढ़ी, मेहरगढ़, तरकई किला, रहमान ढ़ेरी तथा गुजरात का नागवाड़ा से प्राप्त विशिष्टताएं आगे चलकर परिपक्व हड़प्पा सभ्यता में भी मौजूद रही।
आरंभिक हड़‌प्पाई संस्कृ‌तियों के लोग कृषि उत्पादन व अधिशेष कृषि (जैसा कि कालीबंगा व मेहरगढ़ से साक्ष्य प्राप्त है।), मोहरें, मनकें, मृण्मूर्तियां आदि की निरंतरता विकसित हड़प्पा सभ्यता तक देखने को मिलती हैं साथ ही साथ रहमान ढ़ेरी, तरकई किला व मेहरगढ़ से प्राप्त किलेबंदी के साक्ष्य तो विकसित चरण के प्रमुख लक्षण थे। इन बस्तियों से प्राप्त मुहरे, स्फटिक, लाजवर्द, जैसे पत्थर दूरस्थ व्यापार का संकेत देती है साथ ही मुद्रांकनों में प्राप्त कूबड़ वाला बैल, पीपल की पत्ती तथा ज्यामितिय चिन्ह भी विकसित हड़प्पा की विशेषता रही है।.
उपरोक्त आधारों के साथ- साथ आरंभिक बस्तियों के लोग कस्बाई जीवन की शुरुआत कर चुके थे तथा पक्के घरों में रहना तथा दूरस्थ व्यापार के साथ रक्षा तकनीक का भी प्रयोग (दुर्ग का निर्माण) करते थे। इतिहासकार डी०डी० कौशाम्बी के कार्य-कारण सिद्धान्त द्वारा हड़प्पा से पूर्व की संस्कृतियों का विस्तार एवं उनकी स्थिति इस स्थिति को प्राप्त कर ली थी कि वे एक सभ्यता के रूप में रुपान्तरित हो सकें।
इन सब आधारों के आधार पर यह प्रदर्शित होता है कि आरम्भिक हडप्पाई बस्तियों का विस्तार स्वयं ही हड़प्पा सभ्यता को जन्म देने में समर्थ थी।