सम्राट शतानिक के पास वह सब कुछ है, जिसे पाने के लिए मनुष्य जीवन भर संघर्ष करता है सत्ता, वैभव, विजय और प्रतिष्ठा। फिर भी उसके भीतर एक ऐसा प्रश्न जन्म लेता है, जिसका उत्तर किसी राजसभा में नहीं मिलता कि “ क्या मनुष्य के दुःख का अंत उसकी स्वतंत्र चेतना के अंत से किया जा सकता है?”
इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए शतानिक हिमालय के गुप्त आश्रमों, प्राचीन सप्ताग्नियों और नैमिषारण्य की उस भूमिगत स्मृति-नगरी तक, जहाँ अतीत केवल इतिहास नहीं, बल्कि जीवित चेतना है, तक पहुँचते हैं। वहाँ उनका सामना ऐसी ऊर्जा से होता है, जो संसार को जीतना नहीं चाहती बल्कि केवल मनुष्य के दुःख को समाप्त करना चाहती है। किंतु उस मुक्ति की कीमत है स्वतंत्र इच्छा, स्मृति और व्यक्तिगत चेतना का विलय।
यहां शतानिक यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करेगें पर इस बार आहुति केवल घृत की नहीं है। आहुति है अहंकार की...आहुति है अज्ञान की...आहुति है उस ‘मैं’ की, जो स्वयं को ही अपना अंतिम सत्य समझता है।
आहुति से उत्पन्न वह त्रिपुण्ड की तीन रेखाएँ अब केवल भस्म का चिह्न नहीं रहेगीं वे बन जाएगीं-ं अज्ञान के विघटन, कर्म के शुद्धिकरण और अहंकार के विसर्जन की तीन अवस्थाएँ। सरयू बहती रहेगी....अग्नि जलती रहेगी...स्मृतियाँ जागती रहेगी, और शतानिक को अंततः उस प्रश्न के सामने खड़ा होना पड़ेगा, जिससे कोई भी मनुष्य नहीं बच सकता,-“मैं कौन हूँ?”और यहीं अग्नि से आरम्भ हुई यह यात्रा शून्य तक जाएगी, तथा शून्य के उस पार शायद वही है, जिसे ऋषियों ने कहा था- अनादि चिन्ह।Tripund - Ek Mahayagya / त्रिपुण्ड - एक महायज्ञ: भाग - 1 अग्नि से शून्य तक / Bhaag - 1 Agni se Shunya Tak https://amzn.in/d/0615iAU3
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