बहता आकाश,
ना ठहरा,
रंग गहरा,
हुआ बदरंग जब,
बादलों का पहरा,
शून्य से टकरा गया,
मन हार गया,
क्यों वो साकार गया,
खुद का आकार गया,
स्वयं को नकार गया,.......
फिर से प्रबल प्रतिकार हुआ,
जैसे सोवियत से जार गया,
हिन्द के पार गया,
लेकर अपार गया,
सिंधु को छान गया,
गंगा का मान गया,
विंध्य को उखाड़ गया,
सबको पछाड़ गया,
टीपू का आन गया,
पेशवा का बान गया,
लालच नवाबों से,
मुगलओं का शान गया,
गाँधी का गान गया,
भगत का बलिदान गया,
हिन्दी महान गया,
भारत का प्रान गया,........
मन को संभाल,
अब यही है हाल,
लेकर कलम बैठ,
बना ले अपनी पैठ,
लिख दे एक लेख,
बन जा तु आलेख,
प्रेम के सागर को,
आँखों में उकेर,
हृदय को तु थाम,
बात नहीं आम,
हिन्दी बचाने में,
क्या क्या तु कर गया,
ये समय है आ गया,
स्वयं को बता गया,
हिन्दी महान थी... अब,
उसका समय आ गया ।।