विनय न समझे वो खल है 

दुर्जन जो बोले वो छल है

करे नष्ट विचारों को

और ढूंढे नई पहेली को

सखि कहें बसंत है

उसका कहना कि है पतझड़

यही सुना और लिखा अचल 

कपटी का अमृत ही छल है।।

#सत्येन्द्र तिवारी