पूर्णिमा की रात थी, लेकिन चंद्रग्रहण ने उसे और भी मोहक बना दिया था। किले के बाग़ में बेला और रातरानी की खुशबू फैली हुई थी, ठंडी सर्द हवा पेड़ों के पत्तों को हौले-हौले छूकर बह रही थी। झील के किनारे खड़ी देवमुखि ने जल में अपनी परछाईं देखी।

उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी, एक अनकहा आकर्षण, जिसे उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था।

तभी, पीछे से धीमे कदमों की आहट हुई।

....... महर्षि आरुणि।।

कैसी हो देवमुखि,

महर्षि को देख देवमुखि अपने मन की ब्रह्मांडीय यात्रा से बिना क्षण गंवाए आरुणि को प्रणाम करती है, 

मैं ठीक हूं प्रभु।

............ आगे