जब राहें धुंधली हो जाएँ,
सभी दिशाएँ मौन हो जाएँ,
जब मन के भीतर का सूरज
बादल बनकर सो जाए
तब आओ एक दीप जलाएँ।
एक छोटा-सा दीप जलाएँ।।
तेल नहीं, विश्वास सही,
बाती नहीं तो साँस सही,
हाथों में यदि शक्ति न हो,
हृदय में फिर भी आस सही।।
टूटी नाव किनारे होगी,
लहरें चाहे भारी होंगी,
चलना होगा उन राहों पर
जिनमें काँटे सारी होंगी।।
जो गिरकर भी उठ सकता है,
वही समय को मोड़ सकेगा,
जो आँधी में दीप बचाए,
वही सवेरा जोड़ सकेगा।।
नफरत की दीवारें ऊँचीं,
प्रेमवक्ष पर खंजर खींची,
सूनी आँखों के भीतर जब
एक स्वप्न भी जीवित मिलेगा।
तब आओ एक दीप जलाएँ।
एक छोटा-सा दीप जलाएँ।।
आओ स्वप्न को रम्य बनाएँ,
मौन हृदय को शब्द बनाएँ,
अपने भीतर सोई ज्योति को
प्रेम-बंधन से आज जगाएँ।।
अंधकार से युद्ध नहीं है,
बस प्रकाश को लाना है,
एक दीप से दूसरे दीप तक
ज्योति-पथ को सजाना है।।
कल कैसा होगा, कौन बताए?
आज हमारा हाथ तो है।
रात भले ही लंबी हो पर
हममें अभी प्रभात तो है।।
इसलिए मत हारो साथी,
मत जीवन से दूर रहो
जहाँ बुझी हो आशा की लौ,
वहाँ अपना दीप जलाओ।।
और यदि अकेला दीप जले,
तो भी उसका मान रहे,
एक किरण पर्याप्त होती है
जब मन में विश्वास रहे।।
आओ फिर से हाथ मिलाएं,
अपने भीतर प्रेम जगाएं
वह दीपक जो बुझ रहा है,
उसमें फिर से राग जगाएं।
तब आओ एक
दीप जलाएँ।
एक छोटा-सा दीप जलाएँ।।
.......Satyendra tiwari