हिम ये पिघल रहा,
रेत भी अब जल रहा।
रोप एक वृक्ष बीज, क्यों न तू संभल रहा ।।
पृथ्वी अब बिलख रही,
दूर जीवन हो रहा।
मेघ से जो प्रेम हो, फिर, क्यों न तू संभल रहा ।।
फंस गया है संशलिष्ट,
रो रहा है सोशलिस्ट ।
बढ़ रहा है फासिस्ट,
उड़ रहा कैपिटलिस्ट ।
है ये एक अंबुधी, अप्रतिहत गरज रहा।
देख गर्जन मेघ भी, अमानिशा सा डर रहा।
दूर जीवन हो रहा, फिर, क्यों न तू संभल रहा ।।
वाद है कई यहां,
खुद से लड़ रहा खुदा।
मैंने तो बस नस्ल दी, मनुष्य क्या ये कर रहा।
छिनता ये सत्व, तम बढ़ा महत्व,
स्वयं को तू सिद्ध कर, और कर इसे विनष्ट,
चीखती ये चोटियां, नभ चुंबी भी अब डर रहा,
फिर, क्यों न तू संभल रहा ।।
विंध्य का ये त्याग,
नर्मदा की धार,
शब्दहीन पर्वत से, उठ रही है आंच,
शैया पर लेटे भीष्म सा, असहाय 'सत्य' कह रहा,
फिर, क्यों न तू संभल रहा। क्यों न तू संभल रहा ।।
शिष्टता अब पिस रही,
अशिष्टता इतरा रहा।
भूला त्याग पुण्य का, अब पाप को बढ़ा रहा।
श्रेय में डूबा बिलखता, स्वयं को समझा रहा।
है असाध्य रोग ये, फिर, क्यों न तू संभल रहा।
फिर क्यों न तू संभल रहा ।।