मासिनी सभ्यता की निर्माता एकियत जाति की ऐसी कोई विशेषता नहीं दिखी जिससे उन्हें आर्य कहा जाए। लेकिन जब उनकी लिपि भाइनियर बी' पड़ी गयी तो वह हिन्द-यूरोपीय थी, जिससे उनका आर्य होना सिद्ध हुमा।

रामचन्छन सहित कई विद्वानों ने हड़प्पाई लिपि पढ़ने क्या है और यह निष्कर्ष निकाला, का गुण किया फि उसमें निष्कर्ष निकाला है, जि नाम भी शामिल हैं। थे। इस भायार हडप्पा सभ्यता के निर्माताओं का आर्य होना सिद्ध किया गया है।

लेकिन -

प्रतिपक्ष सैंधव लिपि अभी तक सर्वसम्मती प्राप्त नहीं कर सकी अतः तथ्य को मर्णतः स्वीकार्य नहीं किया जा सकता कि सैंथव इस हिन्द-यूरोपीय भाषा बोलते थे।

तर्क आर्यों का समय और उनकी सांस्कृतिक विशेषताएं सैंधों से मिल्स थी।

भाधार आर्य पशुचारक एवं ग्राम्य संस्कृति के वाहक रहे हैं जबकि सैंधव नगरीय सभ्यता के। यही नहीं ऋग्वेद में आर्यों को पुर तोड़ने वाला (जैसा कि इन्ड के लिए प्रयुक्त शब्द पुरन्दर से प्रतीत होता है। कहा गया है। ऐसे में प्रश्न यह है कि एक ही जाति निर्माता व विध्वंसाफ कैसे हो सकती है। उसी प्रकार आर्यों को अप का ज्ञान था और वे रथ का प्रयोग करते थे जबकि संघप उसले ज्ञान से बेचित थे।

. हड‌प्पपईयों के बर्तन गुलाबी रंग के हैं है जबकि भावों के धूसर (gray) रंग के और दोनों के आकार तथा बनावट में भी भत्तर है। अब तक के अध्यक्षों के आधार पर हड़प्पा मातृ‌सत्तात्मक मानी गयी है जबकि भार्य पितृसतात्मक थे।

भार्य पढ्न करते जबकि हड्प्पाईयों द्वारा कुष अपवादों की धोकर (कालीबंगा, राखीगदी, बझापली, लोयल) रास करने के अफशेष नहीं मिले है।

हइप्यारे लिंगपूचक थे जबकि आर्य आरम्भ में ने हीं मूर्तिप्रजक और न ही लिंगपूजक थे।.

निष्कर्ष

 * सैंथवों का आर्य होना लिपि पर आधारित है जो कि अब तक सम्पूर्ण रूप में और सर्वस्वीकृति ढंग से पढ़ी नहीं जा सकी जबकि शेष पुरातात्विक प्रमाण आयर्यों के सैंधप निर्माता होने के विपरित जाते हैं। इसलिए जब तक लिपि प्रमाणिकता हासिल न कर लें तब तक यह मानता तर्फ संगत होगा कि आर्य सिन्धु सभ्यता के निर्माता नहीं थे।

# क्या आरम्भिक संस्कृतियां ही सिन्धु घाटी सभ्यता की निर्माता भी भूयपा सिन्यु घाटी सभ्यता का उदय आराम्भक संस्कृतियों से ही हुमा था?

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१.यदि पुरातात्विक चरणों में क्रमबद्धता एवं निरन्तरता है तो 1 मध्यवर्ती चरण विकास का परिणाम माना जा सकता है।

ⅱ) एक ही स्थल से तीनों चरणों की उपस्थिति मिलें अर्थात् निरन्तरता

iii) आराभिक हड़प्पा संस्कृतियां आबूर उत्पादून प्रक्रिया, शिल्प व व्यापार तथा अन्य, मानपीय गतिविधियों में उस स्तंद्र को प्राप्त कर चुकी हो जहाँ हड़प्पाई विशेषताएं मौज (अंशतः यो पूर्णतः) ।. मौजूद मिले।

पुरातत्वविदों ने सैंधव व चोलिस्तान (पंजाब राजस्थ

बोल का उत्खनन कर कुछ पुरास्थलों का जो विश्लेषण किया है उससे दो प्रकार के निष्कर्ष सामने आये-


प्रथम लगभग आधे आराभिक हड़प्पार प्ररास्थलों पर सैंथव नगरों का निर्माण हुआ जबकि शेष त्याग दिए गए।

द्वितीय- जो आरामिक हड़प्पाई स्थल व्याग पिए गए थे उनकी नगरीय सभ्यता के निर्माण में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं रही।

उपरोक्त विवरण से इतना तो स्थाष्ट हो जाता है कि

लगभग आधी आरामिक हड़प्पाई बतियों ने सभ्यता के निर्माण में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी परन्तु जो बस्तियां त्याग दी गई थी उनकी

सभ्यता के निर्माण में क्या कोई भूमिका नहीं रही होगी।, वर्तमान नगरीय व्यक्धा और अकी ग्राम्य अर्थव्यवस्था पर कई प्रकार की निर्भरताओं के आधार पर यह अनुमान व्यक्त किया जा सकता है कि त्यागी गयी गतिगों ने भी किसी न किती

की भूमिका सैंधव सभ्यता के निर्माण में अवश्य निभाई होगी।

आरम्भिक हड्‌प्प्पई बस्तियों के भौगोलिक पिस्तार को देखें तो ये सिन्य, बलुचिस्तान, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, और यहां तक M


नाम दिया गया, दुर्ग के बाहर जुते हुए खेत प्राप्त हुए है। यहां पर

του की अफगानिस्तान तक विस्तृत थी। उस समस्त भौगोलिक परिवेश के भन्दर आरात्रिफ हड़प्पाई संस्कृतियों के लोग पशुचारण, कृषि उत्पादन उल्लेखनीय है कि सोभी संस्कृति में जिसे बाद में कालीलगा

दोहरी खेती के प्रमाण मिलते है जो प्राराभिक चरण च में ही कृषि प्रो० के ज्ञान और अधिशेष उत्पादन को प्रमाणित करते है।), शिल्प (प्रष्मुर्तियां, मोहरें, मनणे, स्त्री प्रण्युतिया हड्प्या के विकासित चरण तक अन्य शिल्प वस्तुओं के साथ-साथ

निरन्तरता प्रकट करती है।), व्यापार पुष्यात देरी, तर‌कई फिला, मेहगढ़ से किलेबंदी के साक्ष्य भी मिले है जो विकासित चहण का प्रमुख बाबूश है। इन्टी बातिमों से प्राप्त मुहर तथा स्फटिक, लाजवर्ष, वरिल दूरस्थ व्यापार का संकेत करते है।. भादि के साथ आदि पत्थर इन स्थलों से प्राप्त मुद्रांकनों कुबड वाला बैल, पीपल की पत्ती 10 तथा कुछ ज्यामितिय चिन्ह) की विषय वस्तु वहीं है जो पिकसित 00 10:00 हडप्पा की है। तात्पर्य यह हुआ की भादाभिक चरण में ही कस्बाई जीवन की शुरूमात हो चुकी थी और इन संस्कृतियों के लोगों ने पक्के घर बनाना, खा तकनीक का प्रयोग करना तथा दूरस्थ व्यापार करना सीख लिया था।

निष्कर्ष

NOTE भारतीय पुरातात्विक अध्ययन के आधार पर यह कहां जा सकता है कि लगभग 5500 BC से 3500 BC खाधोत्पादन 12:00 समुदाय में आराम्भक ग्राम्य जीपन की शुरुआत की।

13500 से 2500 BC आराभिक ग्राम्य संस्कृतियों का उदय हुआ उन्होंने कृषि उत्पादन तकनीक, तांबे एवं पत्थर के उपकरण, 200 व्यापार आदि सीखा और कस्बाई जीवन के भारम्भ तक पंहुची तत्पश्चात् 2500 BC से 2000BC नगरीय सभ्यता का

उदय एवं स्थापना हुमा /: निष्कर्षतः सभ्यता सांस्कृतिक विकास की दीर्घ परम्परा का ही परिणाम प्रतीत होती है। थी ।.