भारत-पाकिस्तान संबंधः- संघर्ष, चुनौतियाँ और शांति की संभावनाएँ
भूमिकाः-
भारत और पाकिस्तान के संबंध दक्षिण एशिया की राजनीति का सबसे जटिल और संवेदनशील विषय हैं। 1947 के विभाजन से जन्मा यह संबंध इतिहास, भू-राजनीति, सुरक्षा, आतंकवाद, कश्मीर, जल, परमाणु हथियार और महाशक्तियों की राजनीति जैसे अनेक आयामों से प्रभावित है। दोनों देश कई युद्ध लड़ चुके हैं, किंतु इसके बावजूद सांस्कृतिक निकटता, साझा इतिहास और आर्थिक संभावनाएँ उन्हें सहयोग की आवश्यकता का भी बोध कराती हैं। 2025 के पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद हुए सैन्य टकराव ने संबंधों को एक बार फिर गंभीर संकट में पहुँचा दिया। 2026 में भी विश्वास का संकट बना हुआ है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः-
1947 का विभाजन भारत-पाकिस्तान संबंधों की मूल पृष्ठभूमि है। विभाजन के साथ बड़े पैमाने पर जनसंख्या विस्थापन और साम्प्रदायिक हिंसा हुई तथा जम्मू-कश्मीर का प्रश्न दोनों देशों के बीच तत्काल विवाद का विषय बन गया।
इसके बाद 1947-48, 1965 और 1971 में युद्ध हुए। 1971 के युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ। 1999 का कारगिल संघर्ष परमाणु शक्ति संपन्न दोनों देशों के बीच सीमित युद्ध का उदाहरण बना। इस प्रकार सैन्य संघर्षों के साथ-साथ दोनों देशों ने वार्ता के माध्यम से संबंध सुधारने के अनेक प्रयास भी किए।
1972 का शिमला समझौता द्विपक्षीय वार्ता और शांतिपूर्ण ढंग से विवादों के समाधान का महत्वपूर्ण आधार बना। 1999 की लाहौर घोषणा ने परमाणु जोखिम कम करने तथा विश्वास-निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास किया।
वर्तमान संबंधों की प्रमुख चुनौतियाँः-
1. जम्मू-कश्मीर विवादः-
कश्मीर भारत-पाकिस्तान संबंधों का सबसे पुराना और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विवाद है। भारत इसे अपने आंतरिक क्षेत्र से जुड़ा विषय मानता है, जबकि पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। कश्मीर का प्रश्न दोनों देशों की राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा नीति को प्रभावित करता है।
2. सीमा-पार आतंकवादः-
भारत के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती पाकिस्तान से संचालित अथवा वहाँ स्थित आतंकवादी संगठनों से उत्पन्न सीमा-पार आतंकवाद है। मुंबई हमले, उरी, पुलवामा और अन्य घटनाओं ने दोनों देशों के बीच विश्वास को गंभीर रूप से कमजोर किया। 2025 के पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध कड़ा रणनीतिक रुख अपनाया और मई 2025 में सैन्य कार्रवाई की।
भारत की स्पष्ट नीति रही है कि आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते। इसलिए किसी भी स्थायी संवाद के लिए सीमा-पार आतंकवाद पर विश्वसनीय और सत्यापन योग्य कार्रवाई आवश्यक है।
3. जल विवादः-
सिंधु जल संधि, 1960, दोनों देशों के बीच सहयोग का एक असाधारण उदाहरण रही है। युद्धों और लंबे राजनीतिक तनाव के बावजूद यह संधि छह दशकों से अधिक समय तक चलती रही।
हालाँकि अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को आस्थगन में रखने की घोषणा की। 2026 तक दोनों देशों के बीच इसकी स्थिति को लेकर गंभीर मतभेद बने हुए हैं।
यह विषय भविष्य में और महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, हिमनदों का पिघलना, जनसंख्या वृद्धि और जल की बढ़ती मांग सिंधु बेसिन पर दबाव बढ़ा रहे हैं। अतः जल को संघर्ष के हथियार के बजाय सहयोग के माध्यम में बदलना दोनों देशों के दीर्घकालिक हित में होगा।
4. परमाणु आयामः-
भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। इससे पारंपरिक युद्ध की लागत अत्यधिक बढ़ जाती है, लेकिन इसके साथ ही सीमित संघर्ष और परमाणु धमकी के बीच जोखिम भी पैदा होता है।
इसे ‘stability–instability paradox’ के रूप में समझा जा सकता है-परमाणु हथियार बड़े युद्ध को रोक सकते हैं, लेकिन छोटे या सीमित संघर्षों की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं करते।
5. चीन का कारकः-
भारत-पाकिस्तान संबंधों को चीन की भूमिका से अलग करके नहीं देखा जा सकता। चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा तथा पाकिस्तान को चीन का रक्षा सहयोग भारत की सुरक्षा गणना को प्रभावित करते हैं।
इस प्रकार भारत के लिए पाकिस्तान की चुनौती केवल द्विपक्षीय नहीं बल्कि व्यापक China–Pakistan strategic nexus से भी जुड़ जाती है।
संबंधों में सकारात्मक पक्षः-
लगातार तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच कुछ ऐसे तंत्र रहे हैं जिन्होंने पूर्ण संघर्ष की स्थिति को रोकने में भूमिका निभाई है।
1960 की सिंधु जल संधि
1972 का शिमला समझौता
1999 की लाहौर घोषणा
सीमा पर युद्धविराम संबंधी व्यवस्थाएँ
मानवीय आधार पर बंदियों और मछुआरों की रिहाई
धार्मिक तीर्थयात्राओं से संबंधित व्यवस्थाएँ
सैन्य और राजनयिक स्तर पर संकट-प्रबंधन के सीमित चैनल
इन व्यवस्थाओं का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद टूटने पर भी कुछ संस्थागत संपर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।
भारत की नीति कैसी हो?
भारत को पाकिस्तान के प्रति “सुरक्षा में कठोरता और कूटनीति में संयम” की नीति अपनानी चाहिए।
पहला, आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट zero tolerance नीति जारी रहनी चाहिए। आतंकवाद को सामान्य द्विपक्षीय विवाद से अलग करके देखा जाना चाहिए।
दूसरा, सैन्य प्रतिरोध के साथ प्रभावी संकट-प्रबंधन तंत्र बनाए रखना आवश्यक है। परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच संचार का टूटना अत्यंत खतरनाक हो सकता है।
तीसरा, जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा हित प्रभावित न हों, वहाँ मानवीय, धार्मिक और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
चैथा, जल विवाद को दीर्घकालिक जल-सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखना चाहिए। सिंधु बेसिन में जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भविष्य की व्यवस्था में डेटा साझाकरण, बाढ़ प्रबंधन, जल संरक्षण और आधुनिक जल-प्रबंधन को महत्व दिया जा सकता है। विशेषज्ञों ने भी जल सहयोग को व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण माना है।
पाँचवाँ, भारत को पाकिस्तान के साथ संबंधों को अपनी व्यापक Neighbourhood First vkSj Act East/Indo-Pacific रणनीति के संदर्भ में देखना चाहिए। पाकिस्तान के साथ तनाव भारत की ऊर्जा, व्यापार और मध्य एशिया तक संपर्क की संभावनाओं को भी प्रभावित करता है।
आगे की राहः-
भारत-पाकिस्तान संबंधों का समाधान किसी एक समझौते से संभव नहीं है। इसके लिए चरणबद्ध रणनीति आवश्यक है-
आतंकवाद → विश्वास → संवाद → व्यापार → क्षेत्रीय सहयोग
पहले आतंकवाद और हिंसा में ठोस कमी आवश्यक है। उसके बाद सैन्य एवं राजनयिक संवाद के सीमित चैनलों को सक्रिय किया जा सकता है।इसके बाद व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति और पर्यावरण जैसे कम विवादित क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा सकता है।
दक्षिण एशिया की आर्थिक क्षमता बहुत बड़ी है, लेकिन भारत-पाकिस्तान तनाव क्षेत्रीय एकीकरण की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। इसलिए SAARC जैसी संस्थाओं को पुनर्जीवित करने की दीर्घकालिक संभावना भी दोनों देशों के संबंधों में सुधार से जुड़ी हुई है।
निष्कर्षः-
भारत-पाकिस्तान संबंध केवल दो देशों का विवाद नहीं बल्कि दक्षिण एशिया की शांति, सुरक्षा और विकास का प्रश्न है। इतिहास को बदला नहीं जा सकता, लेकिन इतिहास से भविष्य की दिशा अवश्य तय की जा सकती है।
भारत को आतंकवाद के प्रति कठोर, लेकिन संवाद के प्रति विवेकपूर्ण नीति अपनानी होगी। पाकिस्तान को भी यह समझना होगा कि आतंकवाद और हिंसा के माध्यम से राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने की रणनीति अंततः क्षेत्रीय अस्थिरता को ही बढ़ाती है।
अतः भारत-पाकिस्तान संबंधों का स्थायी समाधान “युद्ध से शांति” की छलांग में नहीं, बल्कि “विश्वास-निर्माण, आतंकवाद-निरोध, संस्थागत संवाद और साझा हितों” की क्रमिक प्रक्रिया में निहित है।